इंसान के जीवन में सत्य से बढ़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। जीवन में सही सुख का अनुभव केवल सत्य के मार्ग पर चलकर ही इंसान को प्राप्त होता है। हाँ, यह भी सत्य है कि जैसे ही इंसान सुख सुविधाएँ पा लेता है वह धीरे-धीरे अपने आप को सत्य से दूर कर लेता है। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो सफलता प्राप्त कर के भी सत्य का अवलम्बन नहीं छोड़ते हैं। ऐसे ही एक कथा प्रस्तुत है हमारे समक्ष, महाभारत काल से: अश्वत्थामा।

जहाँ एक तरफ पाण्डव हैं जिन्होंने अनेक विकट परिस्तिथियों का सामना करके भी सत्य निष्ठा का अवलम्बन नहीं छोड़ा, वहीँ दूसरी ओर कौरव और उनके सहायक जिन्होंने हमेशा असत्य को सत्य मानकर स्वीकार किया और उसी विष भरी दृष्टि के साथ जीने लगे। कोई कुकर्म करने से पहले एक बार भी कौरवों ने अपने या अपनों के बारे में विचार नहीं किया।

यह है कथा उस धर्म युद्ध की जो कुंती के पांच पाण्डव और गांधारी के सौ पुत्र के मध्य हुआ था। कौरवों की संख्या अधिक भी थी और उनके पक्ष को मजबूत करते हुए भीष्माचार्य, गुरु द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वत्थामा, कर्ण और अन्य राजा महाराज भी उनके हिमायती बने। जब कि पाण्डवों ने केवल एक सत्य को ही चुना और इसीलिए भगवान् श्री कृष्ण उनकी सहायता हेतु हमेशा प्रत्यक्ष रहे। यह ठीक वैसा ही सन्दर्भ है जब समुद्र मंथन के समय पर, सुर-असुर दोनों ने मिलकर मंदर पर्वत का मंथन किया था। यहाँ एक तरफ थे पाण्डव जिन्होंने सत्य के लिए लड़ाई स्वीकार की और दूसरी ओर स्वार्थ और अहंकार के प्रत्यक्ष थे कौरव और उनके सहयोगी दल।

तो यहाँ शुरू होती है कहानी अश्वत्थामा के दृष्टिकोण और विचारों की। ब्राह्मण पुत्र होने के कारण वह अवश्य ही एक ज्ञानी थे लेकिन बुराई का साथ चुनकर और अनेक गलतियाँ करके उन्होंने स्वयं अपने भविष्य को नरक बना दिया था।
जब कभी कोई भी निर्णय लेना हो या फिर कार्य करना हो तो अनेक बार सोच विचार कर लेना चाहिए। उसी सोच को स्वीकारना चाहिए जो सभी के लिए उपयोगी साबित हो। अश्वत्थामा की कथा हमें ये ज्ञान देती है कि हमेशा हमें हमारी संगती को परखना चाहिए। यदि भूल से भी हम किसी गलत संगत में आ गए तो उस से शीघ्र छुटकारा पा लेना चाहिए। अन्यथा परिस्थितियाँ अत्यंत विकट भी हो सकती हैं।

हमारे वेद पुराण यह स्पष्ट करते हैं कि अर्द्धसत्य, मनुष्य के लिए सदैव दुख का कारण और आत्म-मंथन का विषय रहा है। सत्य की खोज और कई अश्वत्थामा हमारे अवचेतन मन का हिस्सा हैं।

‘अश्वत्थामा’ का पात्र इसी द्वंद्व का प्रतीक है।

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